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उत्तराखंड(Uttarakhand) में बढ़ रहे आत्महत्याओं के मामले चिंताजनक

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पिछले कुछ समय में उत्तराखंड में युवा लड़कियों द्वारा आत्महत्या(suicide) के मामलों में लगातार वृद्धि होती जा रही है । इस मामले पर अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को कहीं ना कहीं सोच विचार करने की आवश्यकता है ।

दहेज है मुख्य वजह

अब तक हुई ज्यादकर आत्महत्याओं में दहेज को एक मुख्य वजह माना गया है। वैवाहिक युवतियों की आत्महत्या के मामलों में देखा गया है कि ये युवतियाँ ससुराल वालों पर दहेज का आरोप लगाकर आत्महत्या कर लेती हैं। जिसके बाद कुछ समय तक वह घटना सोशल मीडिया और न्यूज़, अखबारों की सुर्खियां बनी रहती हैं ,लेकिन कुछ समय बाद उन पर कोई भी सोच विचार नहीं करता, और वह खबरें और वह मामले एक ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।

पिछले 1 साल के अंदर देखा जाए तो पूरे उत्तराखंड में लगभग 60 से 70 युवतियों ने आत्महत्या की है। जो कि 1 साल के अंदर काफी बड़ा आंकड़ा है। इन युवतियों की उम्र भी मात्र 20 साल से लेकर 30 साल के अंदर की थी। यानी कि वह काफी युवा अवस्था में ही इतना बड़ा कदम लेने के लिए मजबूर हो गई थी।

पिछले 1 साल में घटी आत्महत्या की प्रमुख घटनाएं

1) पहली घटना उधम सिंह नगर (Udham Singh Nagae ) के दिनेशपुर की है जहां पर 18 वर्ष की एक लड़की ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी।

2) वहीं दूसरी घटना काशीपुर के केलाखेड़ा की है जहाँ पर दीपा नाम की एक लड़की ने दहेज के दबाव में आकर अपनी जान दे दी । उन्होंने आरोप लगाया कि बाजपुर के रहने वाले जगदीश ने उन्हें दहेज के लिए काफी प्रताड़ित किया ।

3) तीसरी घटना की बात करें तो तीसरी घटना देहरादून के डालनवाला की है जहां पर एम के पी कॉलेज की एक 19 वर्षीय छात्रा (फिजा) ने जहर खाकर अपनी जान दे दी। वह देहरादून में b.a. की पढ़ाई कर रही थी।

4) देहरादून के इंद्रा कॉलोनी की एक और घटना है जहां पर 22 साल की अंजली ने जहर खा कर अपनी जान दे दी। वह देहरादून में M. A की पढ़ाई कर रही थी।

5) एक और घटना काशीपुर की है जहां पर अमनदीप कौर ने अपने ससुराल वालों पर दहेज का आरोप लगाते हुए जहर खाकर अपनी जान दे दी थी।

6) पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार की रहने वाले कृतिका ने 15 अगस्त को पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी । कृतिका अभी मात्र 11 वर्ष की थी।

7) एक और घटना में 22 साल की पूजा बिष्ट ने अपने पति नरेश के साथ बातों बातों में हुए विवाद की वजह से जहर खाकर अपनी जान दे दी। पूजा की शादी को अभी मात्र 10 महीने ही हुए थे।

8) हरिद्वार के झबरेड़ा में तैनात देहरादून की रहने वाली महिला कॉन्स्टेबल मंजीता ने अपने कमरे में फांसी लगाकर जान दे दी । हालांकि उनकी आत्महत्या का कोई कारण सामने नहीं आया, लेकिन यह भी एक सोचने वाली बात थी कि किस दबाव में आकर इस महिला कॉन्स्टेबल ने फांसी के फंदे पर लटक कर अपनी जान दी होगी

9) एक और घटना कोचर कॉलोनी देहरादून की है जहां पर अल्मोड़ा के भिकियासैंण की रहने वाली चांदनी ने पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी। वह देहरादून में अपनी दादी के साथ रह रही थी।

लॉकडाउन में बड़े मामले

जहां एक तरफ कोरोनावायरस की वजह से पूरे देश भर में लॉकडाउन था। लोग अपने घरों में कैद थे । वहीं उत्तराखंड में लॉकडाउन के बावजूद भी कई सारी आत्महत्याओं के मामले सामने आए। अगर आंकड़ों की बात करें तो 22 मार्च से 25 अप्रैल तक 20 आत्महत्या के मामले सामने आए। 23 अप्रैल से लेकर 11 मई तक यानी कि 18 दिनों में 25 आत्महत्या के मामले सामने आए । जबकि जनवरी में यहाँ सिर्फ 12 मामले थे । अगर उत्तराखंड में आत्महत्या के मामले इसी तरह बढ़ते रहे तो जल्द ही यह आंकड़ा देशभर में नंबर वन पर हो जाएगा। ऐसे में कहीं ना कहीं सरकार को इस विषय पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि किस तरह से ग्रामीण इलाकों में महिलाओं या नवविवाहित लड़कियों की आत्महत्याओं पर रोक लगाई जा सके

तालमेल की है कमी

मशहूर साइकॉलजिस्ट सोनिका भारद्वाज बताती हैं कि उत्तराखंड में आत्महत्याओं के इतने मामले इसके लिए बढ़ रहे हैं क्योंकि वहां पर देखा गया है कि जिन युवतियों को शादी के बाद दहेज के लिए परेशान किया जाता है या जो महिलाएं यौन उत्पीड़न से परेशान होती हैं वह किसी से अपनी बातें शेयर नहीं कर पाती हैं। या किसी से अपनी अंदरूनी कलह को नहीं बता पाती हैं। अतः वह मन ही मन में परेशान हो जाती है और परेशान होकर एक न एक दिन इस तरह का कदम उठा लेती हैंहमें कहीं न कहीं अपने व्यवहार को बदलने की जरूरत है और उनके साथ घुल मिलकर उनके मन की बात जानने की आवश्यकता है। तभी जाकर इस तरह की घटनाओं पर कुछ विराम लगाया जा सकता है।

ठोस कदम उठाने जरूरी

प्रदेश सरकार ने भी अभी तक उत्तराखंड में बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों को लेकर कोई भी सख्त रुख नहीं अपनाया है और न ही सरकार ने इस और ध्यान दे रही है। युवतियों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह जल्द ही इन मामलों की और गंभीरता से ध्यान दे और इसका कोई संवैधानिक उपाय निकाले।

आपको क्या लगता है कि आत्महत्यों के मामलों में कैसे रोक लगायी जा सकता है ? आप अपने सुझाव हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बता सकते हैं।

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