एक वे राज्य आंदोलनकारी लोग थे, जिनके अथक प्रयासों से हमें हमारा पर्वतीय भू भाग पृथक राज्य उत्तराखंड के रूप में आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त हुआ था। तब उत्तराखंड अपने बाल्य अवस्था में था।

इसलिए किसी भी नवनिर्मित राज्य में मूलभूत सुविधाएं , जनहितकारी योजनायें ,माँगे, और सांस्कृतिक विरासत को बचाने हेतु त्वरित विधेयक,कानून तत्काल संज्ञान में लाना भी तत्कालीन सरकारों हेतु अवश्य मुश्किल रहा होगा,परन्तु आज उत्तराखंड राज्य अपने युवा अवस्था की ओर अग्रसर है। हम जैसी मांगे सरकार के सम्मुख रखेगें सरकारों को जनता की मांग पर तुरंत कार्यवाही तो करनी ही पड़ेगी। क्योंकि यही लोकतंत्र है यही जनता का तंत्र है।

इसलिए मैं अपने समस्त अग्रजों-अनुजों से निवेदन करता हूँ कि उत्तराखंड माँगे भू कानून के नारे को अपनी ध्वनि दीजिये। क्योंकि अगर हमें आज अपनी सांस्कृतिक,राजनैतिक,आर्थिक, धरोहरों को बचाना है तो पहले हमें अपनी जमीन बचानी होगी।

जमीन पर अगर सिर्फ उतराखण्डवासियो का जब जन्मसिद्ध अधिकार होगा तो,हमारे परिवेश में बाहर से आने वाले अन्य सांस्कृतिक विरासत के लोग हमारी संस्कृति के साथ खिचड़ी नही पका पाएंगे। बेशक राष्ट्र विरासतों का मेल होता है,भाषाओं व विभिन्न संस्कृतियों का मेल हो सकता है परन्तु उस मेल का भी अपना एक भौगोलिक आधार अवश्य होना चाहिए। हम हाथीयों को पहाड़ पर नही चढ़ा सकते जिस प्रकार वो जहाँ है जिस परिवेश में है वह उनके लिए सुगम और जीवनवर्धक है।उसी प्रकार काफल के पेड़ जब उत्तरप्रदेश या पंजाब में नही लगा सकते है। ठीक उसी प्रकार भाषा बोली, खान पान, रहन सहन के साथ हम छेड़खानी नही कर सकते।

अतः मित्रों स्वामी विवेकानंद जी के कथन में तब तक बढ़ते रहिये जब तक हमें हमारी राज्य सरकार भू कानून बना कर नही दे देती है ।

Note:- इस लेख के लेखक युवा लेखक और कवि अखिलेश नेगी जी हैं। जो कि वर्तमान में देहरादून में कार्यरत हैं और रुद्रप्रयाग,अगस्त्यमुनि से ताल्लुक रखते हैं।

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