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जानिईये कैसे मिलता है सावन के महीने में भगवान शिव के व्रतों का उचित फल

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सावन का महीना हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक हिंदूओं का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने हिंदू धर्म के सभी लोग भगवान शिव भोलेनाथ की अराधना करते हैं और माना जाता है कि इस महीने उपवास रखने से इंसान द्वारा किए हुए सारे पाप मुक्त हो जाते हैं। सावन के महीने में जगह-जगह से लोग गंगाजल लेकर भगवान भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंग के भी दर्शन करते हैं जिनमें से केदारनाथ उनका सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ सावन के महीने में कावड़ियों ओर भक्तों का मेला सा लगा रहता है।लेकिन इस बार कोरोना महामारी के चलते कांवड़ यात्रा पर पूरी तरह से पाबंदी लगाई गई है,फिर भी भगवान भोलेनाथ की आस्था में कोई कमी नहीं हुई है। इस बार लोग अपने-अपने घरों में ही रहकर भगवान भोले की आराधना कर रहे हैं।

आज हम आपको बताएंगे कि सावन के महीने में सोमवार को उपवास रखने से क्या फल प्राप्त होते हैं, तो इसे हम आपको भगवान शिव की एक कहानी के माध्यम से समझाते हैं,की सावन के महीने में भगवान शिव के उपवास करने से भोलेनाथ कितने प्रसन्न होते हैं ओर भगवान शिव अपने भक्तों से क्या चाहते हैं।तो एक बार….

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती कठोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी तो उसी समय उन्हें एक बालक के डुबने की चीख सुनाई दी। माता तुरंत अपनी तपस्या से उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा की एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है। बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तथा मगरमच्छ उसे आहार बनाने का। करुणामयी मां को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया कि वह बालक को छोड़ दे और इसे आहार न बनाए। मगरमच्छ बोला माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है,उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है। माता पार्वती ने फिर कहा आप इसे छोड़ दे इसके बदले मैं अपनी तपस्या का फल आपको दे दुंगी। ऐसे में कुछ रुककर मगरमच्छ मान गया,ओर माता पार्वती ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का पुण्य फल उस मगरमच्छ को दे दिया

तपस्या के फल को प्राप्त करते ही मगरमच्छ सूर्य की भांति चमक उठा। उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई। इसे देख उसने माता पार्वती से अपना पुण्य वापस लेने की गुजारिश की ओर कहा कि मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा। तब माता पार्वती ने ऐसा करने से मना कर दिया तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माता सा दुलारने लगी। बालक को सुरक्षित लौटाकर, माता पार्वती ने अपने स्थान पर वापस आकर तप फिर से शुरु कर दिया। तभी भगवान शिव खुद तुरंत ही वहां प्रकट हो गए, और बोले पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को अपने तप का फल दिया तो वह मुझे ही प्राप्त हुआ। अत: तुम्हारा तप फल अनंत अमृत हो गया। तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की अत: मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं ओर तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं।

इस कहानी के माध्यम से हमें पता चलता है कि जो परहित की कामना करता है। उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है। जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको स्वीकार करते हैं। उसी प्रकार उपवास करना हर मनुष्य की एक चेष्टा होती है और वह भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास या व्रत रखता है।

वैसे कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है कि आपको उपवास करना जरुरी है लेकिन भोलेनाथ के भक्त अपनी श्रद्धा के मुताबिक ही सावन के हर सोमवार को व्रत रखते हैं ओर ऐसा माना जाता है कि सावन के सोमवार को व्रत रखने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं लेकिन साक्षात भगवान शिव यह भी मानते हैं कि सोमवार को उपवास रखने के बजाए यदि आप उस दिन के कुछ भोजन जैसे फल, दूध,घी या अन्य जरूरी खाद्य पदार्थो को अगर किसी जरुरतमंद या किसी ऐसे व्यक्ति को दान करते हैं जिसको की इनकी सबसे ज्यादा जरुरत होती है तो आपका वह पुण्य भी एक उपवास या व्रत के सामान सफल माना जाएगा और भगवान शिव भी आपके इस पुण्य से काफी प्रसन्न हो जाएंगे।

Source:-alamy stock photo

ऐसा नहीं है कि सिर्फ व्रत रखना या उपवास करना जरुरी है। अगर आप सोमवार के दिन या सावन के महीने में किसी जरुरतमंद व्यक्ति की मदद करते हैं या किसी भी भूखे इंसान को खाना देते हैं या कोई ऐसी वस्तु भेंट करते हैं जिसकी किसी इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत हो तो वह भी भोलेनाथ की भक्ति का एक प्रतीक है,एक व्रत है,एक उपवास है।जिससे कि भगवान काफी प्रसन्न होते हैं।

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