जख्या का इंग्लिश नाम क्लोमा विस्कोसा (Cleome viscosa) है। इसे संस्कृत में अजगन्धा हिन्दी में बगड़ा, हुलहुल तथा अंग्रेजी में एशियन स्पाइडर फ्लावर (Asian Spider Flower), वाइल्ड मस्टर्ड के (Wild mustard), Tickweed या Yellow spider flowerके नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखंड में इसका  स्थानीय नाम जख्या या जखिया है।  यह उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में तड़के के रूप में सबसे ज़्यादा  इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा और लोकप्रिय मसालों में से एक है।इसके बीज हल्के काले ओर भूरे रंग के होते हैं जो बिल्कुल राई ओर सरसों के बीज की तरह होता है.

तड़के के रूप में लगने वाला यह मसाला पहाड़ी खाने की मुख्य पहचानों में से एक है, जख्या के बीजों के साथ साथ इसके पत्तों का साग भी बनाया जाता है.पहाड़ों में कड़ी, हरी सब्ज़ी,आलू के गुठके,पहाड़ी रायते और गथवाणी तो मानो बिना जख्या के तड़के के अधूरे रहते हैं 

जख्या का स्वाद एक बार जिसकी जुबान पर लग जाए तो वह इसका दिवाना हो जाता है। 800 से 1500 मीटर की ऊँचाई में प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह जंगली पौधा पीले फूलों और रोयेंदार तने वाला होता  है। यह एक मीटर ऊँचा, पीले फूल व लम्बी फली वाला जख्या बंजर खेतों में बरसात में उगता है। पहाड़ों में  यह  जखिया खरपतवार ही नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण फसल भी बन सकता  है। अजगन्धा का उल्लेख कैवय देव निघण्टु, धन्वंतरि निघण्टु, राज निघण्टु में में भी मिलता है। जख्या की पत्तियां घाव व अल्सर को ठीक करने में सहायक होती हैं। इसके अलावा बुखार, सरदर्द, कान की बीमारियों की औषधि हेतु भी इसका उपयोग होता है।  विभिन शोधों के पता चलता है की इसमें एंटी-हेल्मिंथिक, एनाल्जेसिक, एंटीपीयरेटिक, एंटी-डायरियल, हेपेटोप्रोटेक्टिव और एलिलोपैथिक जैसे कई  गुण शामिल हैं. जख्या में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्व खान-पान में इसके महत्त्व को और अधिक बड़ा देते हैं. इसके बीज में पाए जाने वाला 18 फीसदी तेल फैटी एसिड तथा अमीनो अम्ल जैसे गुणों से परिपूर्ण होता है.  साथ ही इसके बीजों में फाइबर, स्टार्च, कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, विटामिन ई व सी, कैल्शियम, मैगनीशियम, पोटेशियम, सोडियम, आयरन, मैगनीज और जिंक आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। पहाड़ की परंपरागत चिकित्सा पद्धति में जखिया का खूब इस्तेमाल किया जाता है। एंटीसेप्टिक, रक्तशोधक, स्वेदकारी, ज्वरनाशक इत्यादि गुणों से युक्त होने के कारण बुखार, खांसी, हैजा, एसिडिटी, गठिया, अल्सर आदि रोगों में जख्या बहुत कारगर माना जाता है। पहाड़ों में किसी को चोट लग जाने पर घाव में इसकी पत्तियों को पीसकर लगाया जाता है जिससे घाव जल्दी भर जाता है। आज भी पहाड़ में मानसिक रोगियों को इसका अर्क पिलाया जाता है। जखिया के बीज में coumarinolignoids रासायनिक अवयव का स्रोत होने से भी फार्मास्यूटिकल उद्योग में लीवर सम्बन्धी बीमारियों के निवारण के लिये अधिक मांग रहती है। वर्ष 2012 में प्रकाशित इण्डियन जनरल ऑफ एक्सपरीमेंटल बायोलॉजी के एक शोध पत्र के अध्ययन के अनुसार जख्या के तेल में जैट्रोफा की तरह ही गुणधर्म, विस्कोसिटी, घनत्व होने के वजह से ही भविष्य में बायोफ्यूल उत्पादन के लिये परिकल्पना की जा रही है।

संक्षिप्त में उपयोग:

*आयुर्वेद में यह एक एंटीहेलमेंटी, प्रचार खुजली,जठरांत्र संबंधी संक्रमण और आंत्र विकारों जैसे कई अन्य रोगों के रूप में उपयोग किया जाता है।

*दाद, पेट फूलना, पेट का दर्द, अपच, खांसी के इलाज में इस जड़ी बूटी का उपयोग किया जाता है।

*इसके कुचले हुए पत्तों को ग्वारपाठा के बीजों के उपचार के रूप में उपयोग किया जाता है, ताकि खरपतवार की रोकथाम की जा सके।

*पत्तियों का उपयोग घाव और अल्सर के बाहरी अनुप्रयोग के रूप में किया जाता है। इसके बीज कृमिनाशक होते हैं।

*पत्तियों का रस कान से मवाद के स्राव के को रोकने के उपाय के रूप में उपयोग किया जाता है। जख्या के पौधे की पत्तियां घाव और अल्सर को ठीक करने में उपयोगी हैं।

*संक्रमण, बुखार और सिरदर्द का इलाज करने के लिए जख्या के बीज उपयोगी बताया गया है। जख्या के पेड़ की जड़ स्कर्वी और गठिया के लिए भी उपयोगी है।

*पौधे के सभी भागों का उपयोग यकृत रोगों, पुरानी दर्दनाक जोड़ों और मानसिक विकारों में किया जाता है।

*जख्या के पौधे का उपयोग , सूजन, लीवर की बीमारियों, ब्रोंकाइटिस और दस्त के इलाज के लिए अच्छा माना जाता है।

*जख्या के बीजों से निकाले गए तेल में औषधीय गुण होते हैं। कुचले हुए बीजों के ताजे तेल का उपयोग शिशु के ऐंठन और मानसिक विकारों के इलाज के लिए किया जाता है।

*खनिज पदार्थ इसे उच्च आर्थिक महत्व की फसल बना सकते हैं। जख्या के पौधे को जैवईंधन का एक कुशल स्रोत माना जा सकता है। पौधे के तेल में सभी गुण होते हैं जो जेट्रोफा और पोंगामिया में होते हैं।

*कुछ अन्य स्थानों पर जख्या का उपयोग कभी-कभी पत्ती की सब्जी के रूप में  भी किया जाता है। कड़वे पत्ते स्थानीय रूप से लोकप्रिय हैं और ताजा, सूखे या पका के खाए जाते हैं।

*जख्या के अपरिपक़्व फल भी खाए जाते हैं। जिन बीजों में एक अनोखा स्वाद होता है, वे मसालेदार, सॉसेज, सब्जियां, करी और दालें तैयार करने में सरसों के बीज और जीरा के विकल्प के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

*जिन क्षेत्रों में यह बहुतायत में होता है, वहाँ पर इसका उपयोग आवरण संयंत्र के रूप में और हरी खाद के रूप में किया जा सकता है ।

*अफ्रीका और एशिया में पत्तियों और बीजों को रुबफेशिएंट और वेसिकेंट के रूप में और संक्रमण, बुखार के इलाज के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

*पूरे जड़ी बूटी को गठिया रोग की रोकथाम के लिए शरीर पर मला जाता है। दाद संक्रमण के इलाज के लिए बाहरी रूप से लगाए जाने पर ब्रूस की पत्तियों को काउंटर-इरिटेंट माना जाता है।

*इससे बने काढ़े को एक एक्सपेक्टरेंट और पाचन उत्तेजक के रूप में प्रयोग किया जाता है जैसे कि शूल और पेचिश को ठीक करने हेतु  काम में लाया जाता है।

इसके बीज और उसके तेल में कृमिनाशक गुण होते हैं, लेकिन वे कवकजनित रोग राउंडवॉर्म (दाद) संक्रमण के इलाज में अप्रभावी होते हैं।

*जख्या एक व्यावसायिक फसल नहीं है लेकिन वर्तमान में इसके सुखाये गये बीजों की कीमत 250 रूपये से अधिक है। हालांकि यह बरसात के दिनों में बहुत सी जगह एक खरपतवार के रूप में उगता है पर अगर इसे एक व्यवसायिक फसल के रूप में उगाया जाए तो कुछ हद तक पलायन रोकने में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है साथ इसकी माँग बाज़ारों में सदैव रहती है.

लेख़क : शम्भू नौटियाल (जो पेशे से एक शिक्षक हैं ओर वर्तमान में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में कार्यरत हैं )

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