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शहरों में पतंग ,तो पहाड़ों में है आज की खिचड़ी संक्रान्द का खास महत्व

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पूरे भारतवर्ष में मकर संक्रांति का त्यौहार बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है खासकर गुजरात में तो मकर संक्रांति के त्योहार से पहले कई प्रकार की तैयारियां की जाती हैं। मकर संक्रांति के त्योहार पर वहां पतंगबाजी का खूब चलन चलता है तो वहीं भारत के अलग-अलग शहरों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है अगर बात करें उत्तराखंड की तो उत्तराखंड में मकर संक्रांति के त्योहार को खिचड़ी संगरांद या घुघुतिया के तौर पर भी मनाया जाता है तो चलिए हम आपको बताते हैं कि उत्तराखंड में इसे क्यों खिचड़ी संग्राम के तौर पर मनाया जाता है

मकर संक्रांति उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। इसे राज्य के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे कि उत्तरायणी, खिचड़ी संग्रंद, पुष्योदिया, घुघुतिया, घुघुती टायर, काले कौवा, मकारें, मकेरनी, गोस्सा, ग्वालदा और चुण्य्यार। ऐसा माना जाता है कि इस दिन, सूर्य देवता हिंदू कैलेंडर के अनुसार ‘धनु राशी’ से ‘मकर राशी’ में प्रवेश करते हैं। यह भी माना जाता है कि हिंदू ज्योतिष के अनुसार उत्तरायण (नाक्षत्र उत्तरायण) की अवधि का यह पहला दिन है जब दक्षिणी गोलार्ध में छह महीने पूरे करने के बाद सूर्य उत्तरी गोलार्ध में जाने लगता है। इस दिन से, जैसे-जैसे सूर्य शीतकालीन संक्रांति से ग्रीष्म संक्रांति की ओर बढ़ता है, दिन लंबे होने लगते हैं। ऐसा कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन से मौसम में बदलाव का संकेत शुरू हो जाता है।

प्रवासी पक्षी भारत के मैदानी इलाकों से उत्तराखंड की पहाड़ियों में लौटने लगते हैं, जहाँ वे सर्दियों में पहाड़ों पर अत्यधिक ठंड और बर्फबारी से बचने के लिए पलायन करते हैं।

ख़ास मेलों का आयोजन :-

उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में मकर संक्रांति (जिसे घुघुती (घुघुती) या घुघुती त्यार या घुघुतिया या काले कौवा या उत्तरायणी) भी कहा जाता है, को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। इस दिन उत्तराखंड के बागेश्वर में उत्तरायणी मेला ओर उत्तरकाशी में माघ मेले का आयोजन किया जाता है। अल्मोड़ा गजेटियर के अनुसार, बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बागेश्वर में वार्षिक उत्तरायणी मेला लगभग 15,000 लोगों द्वारा दौरा किया गया था और यह कुमाऊं मंडल का सबसे बड़ा मेला था। उत्तरायणी मेला के धार्मिक अनुष्ठान में सरयू और गोमती के संगम पर दिन के पहले स्नान होता है और इसके बाद बागनाथ मंदिर के अंदर भगवान शिव को जल चढ़ाया जाता है। जो लोग अधिक धार्मिक रूप के श्रद्धालु होते हैं, वे उत्तराधिकार में तीन दिनों तक इस अभ्यास को जारी रखते हैं, जिसे “त्रिमगरी” के रूप में जाना जाता है। इस दिन, लोग दान में ‘खिचड़ी’ (दाल और चावल मिलाकर बनाई जाने वाली डिश) भी देते हैं, पवित्र नदियों में औपचारिक पूजा करते हैं, उत्तरायणी मेलों में भाग लेते हैं और घुघुतिया या काले कौवा का त्योहार मनाते हैं।

काले कौवा ‘काला कौवा’ के त्योहार के दौरान, लोग’ घूघुटे ‘बनाते हैं,यह घुघुटे गहरे तले हुए तेल में मीठे आटे और गुड़ से बने होते हैं, जिन्हें आकर्षक आकार में बनाया जाता है, जैसे कि ड्रम, अनार, चाकू और तलवार। इसके बाद घूघट खिलाया जाता है। मकर संक्रांति की सुबह बच्चों द्वारा कौवे और अन्य पक्षी। घुंघरू जप से बने हार को गले लगाते हुए बच्चे गाते हैं कि  :-
“काले कौओ काले घुघुती बड़ा खाले ,
लै कौआ बड़ा , आपु सबुनी के दिए सुनक ठुल ठुल घड़ा ,
रखिये सबुने कै निरोग , सुख समृधि दिए रोज रोज |”

यहाँ कौवा, आओ इस तलवार (गूंथे हुए आटे से बनी) को लें और मुझे समृद्धि (आशीर्वाद) दें… मकर संक्रांति के दौरान कौवों और अन्य पक्षियों को मिठास देने की प्रथा से जुड़ी कई मान्यताएँ हैं। मान्यता है कि कुमाऊं के प्राचीन चंद राजवंश के एक राजा राजा कल्लन सिंह संतानहीन थे और इस स्थिति को दूर करने के लिए, असहाय राजा और रानी ने कुमाऊं के बागनाथ मंदिर में भगवान शिव का आशीर्वाद मांगा। इसके तुरंत बाद, शाही जोड़े को एक बच्चा मिला, जिसका नाम राजा निर्भय सिंह था, जिसे प्यार से ‘घुघुतिया’ कहा जाता था। बच्चे के राजकुमार ने एक मोती का हार पहना था जिसे वह बहुत पसंद कर रहा था और कहा जाता है कि कुमाऊं के इस बच्चे के शौकीन की स्मृति में मकर संक्रांति के दिन बच्चों द्वारा ‘घुघुते’ की माला पहनाई जाती है। एक और किंवदंती है कि कुमाऊँ के एक निश्चित राजा के पास ‘घुघुतिया’ नामक एक मंत्री था जिसने एक बार उसे मारने की साजिश रची थी। राजा के सौभाग्य के बहुत से, एक दयालु कौवा ने उसे घुघुतिया के बुरे इरादों के बारे में चेतावनी दी, इस प्रकार राजा को जीवन का वरदान मिला। कहा जाता है कि कुमाऊं में इस दिन से कौवों को मिठाइयों का प्रसाद बनाने की प्रथा शुरू हुई। वैकल्पिक रूप से, कई लोग मानते हैं कि कौवे को प्रसाद उनके पूर्वजों की दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया जाता है।

वही मकर संक्रांति के पर्व पर कई सारे भक्त धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा में डुबकी लगाते हैं वे दिन में दिन श्रद्धालुओं सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के बाद खिचड़ी का वितरण करते हैं माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी दान देने से अन्नदान का पुण्य प्राप्त होता है।

पतंग का है खास महत्व :-

मकर संक्रांति का त्योहार युवाओं के बीच काफी मशहूर है। देशभर में कई जगह लोग इस दिन पतंग उड़ाते हैं और दिन भर जश्न मनाते हैं खासकर गुजरात में तो यह त्यौहार काफी मशहूर है और यहां दिनभर पतंग उड़ाने की कॉफी होड़ लगी रहती है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने भी मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाई थी और जब उनकी पतन इंद्रलोक पहुंचे तो वहां पर इंद्र की पुत्रवधू ने उस पतंग की डोर काट कर उसे अपने पास रख लिया था। जिसके बाद भगवान श्रीराम ने अपनी पतंग को वापस लाने के लिए हनुमान जी को भेजा। इंद्रलोक पहुंचकर जब हनुमान ने देखा की पतंग तो इंद्र की पुत्रवधू के पास है तो तब उन्होंने उसे पतंग को वापस लौटाने की विनती की ,लेकिन इंद्र के पुत्रवधु जिद करने लगी कि वह श्री राम जी को देखने के बाद ही पतंग वापस लौटाएगी। जब उसका यह संदेश हनुमान जी ने राम जी तक पहुंचाया तब श्रीराम ने इंद्र की पुत्रवधू को आश्वासन दिया कि वह वनवास की यात्रा के दौरान उसे जरूर दर्शन देंगे,और इस आश्वासन के बाद ही इंद्र के पुत्र वधू ने पतंग वापस लौट आई थी।

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